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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बिजली उत्पादन पर टैक्स नहीं लगा सकती राज्य सरकार

बिजली उत्पादन पर टैक्स का अधिकार केंद्र का, उत्तराखंड सरकार को झटका

देहरादून। उत्तराखंड में जलविद्युत परियोजनाओं से विद्युत उत्पादन पर टैक्स लगाए जाने को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। उच्च न्यायालय ने अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि बिजली उत्पादन पर टैक्स लगाने का अधिकार राज्य सरकार के पास नहीं है।

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जलविद्युत कंपनियों की ओर से दायर विशेष अपीलों पर सुनवाई के बाद राज्य सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि “जनरेशन ऑफ इलेक्ट्रिसिटी” पर टैक्स लगाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है, न कि राज्य सरकार के पास। ऐसे में राज्य सरकार द्वारा लगाया गया टैक्स वैध नहीं माना जा सकता।

इस मामले में पहले एकलपीठ ने राज्य सरकार के पक्ष में फैसला देते हुए जलविद्युत कंपनियों की याचिकाएं खारिज कर दी थीं। अदालत ने उस समय माना था कि विधायिका को इस तरह का कानून बनाने का अधिकार है और यह टैक्स पानी के उपयोग पर नहीं बल्कि उससे होने वाले बिजली उत्पादन पर आधारित है।

हालांकि, इस फैसले को विभिन्न हाइड्रो पावर कंपनियों ने चुनौती दी और खंडपीठ में विशेष अपील दाखिल की। सुनवाई के दौरान जजों के बीच मतभेद सामने आने पर मामला पुनः विचार के लिए न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की एकलपीठ को भेजा गया। अब उनकी अदालत ने कंपनियों के पक्ष में फैसला सुनाया है।

मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो राज्य गठन के बाद उत्तराखंड सरकार ने नदियों पर जलविद्युत परियोजनाएं स्थापित करने के लिए निजी और सरकारी कंपनियों को आमंत्रित किया था। समझौते के तहत कुल उत्पादन की 12 प्रतिशत बिजली राज्य को मुफ्त दी जानी थी, जबकि बाकी बिजली उत्तर प्रदेश को बेची जानी थी।

बाद में वर्ष 2012 में राज्य सरकार ने ‘उत्तराखंड वाटर टैक्स ऑन इलेक्ट्रिसिटी जनरेशन एक्ट’ लागू कर जलविद्युत परियोजनाओं पर उनकी क्षमता के अनुसार 2 से 10 पैसे प्रति यूनिट तक टैक्स लगा दिया। इस फैसले के खिलाफ अलकनंदा पावर प्रोजेक्ट, टीएचडीसी, एनएचपीसी समेत कई कंपनियों ने अदालत का रुख किया था।

ताजा फैसले के बाद राज्य में जलविद्युत परियोजनाओं और सरकार के बीच टैक्स को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है और इसका असर भविष्य की ऊर्जा नीतियों पर भी पड़ सकता है।

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देहरादून। उत्तराखंड में जलविद्युत परियोजनाओं से विद्युत उत्पादन पर टैक्स लगाए जाने को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। उच्च न्यायालय ने अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि बिजली उत्पादन पर टैक्स लगाने का अधिकार राज्य सरकार के पास नहीं है।

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जलविद्युत कंपनियों की ओर से दायर विशेष अपीलों पर सुनवाई के बाद राज्य सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि “जनरेशन ऑफ इलेक्ट्रिसिटी” पर टैक्स लगाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है, न कि राज्य सरकार के पास। ऐसे में राज्य सरकार द्वारा लगाया गया टैक्स वैध नहीं माना जा सकता।

इस मामले में पहले एकलपीठ ने राज्य सरकार के पक्ष में फैसला देते हुए जलविद्युत कंपनियों की याचिकाएं खारिज कर दी थीं। अदालत ने उस समय माना था कि विधायिका को इस तरह का कानून बनाने का अधिकार है और यह टैक्स पानी के उपयोग पर नहीं बल्कि उससे होने वाले बिजली उत्पादन पर आधारित है।

हालांकि, इस फैसले को विभिन्न हाइड्रो पावर कंपनियों ने चुनौती दी और खंडपीठ में विशेष अपील दाखिल की। सुनवाई के दौरान जजों के बीच मतभेद सामने आने पर मामला पुनः विचार के लिए न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की एकलपीठ को भेजा गया। अब उनकी अदालत ने कंपनियों के पक्ष में फैसला सुनाया है।

मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो राज्य गठन के बाद उत्तराखंड सरकार ने नदियों पर जलविद्युत परियोजनाएं स्थापित करने के लिए निजी और सरकारी कंपनियों को आमंत्रित किया था। समझौते के तहत कुल उत्पादन की 12 प्रतिशत बिजली राज्य को मुफ्त दी जानी थी, जबकि बाकी बिजली उत्तर प्रदेश को बेची जानी थी।

बाद में वर्ष 2012 में राज्य सरकार ने ‘उत्तराखंड वाटर टैक्स ऑन इलेक्ट्रिसिटी जनरेशन एक्ट’ लागू कर जलविद्युत परियोजनाओं पर उनकी क्षमता के अनुसार 2 से 10 पैसे प्रति यूनिट तक टैक्स लगा दिया। इस फैसले के खिलाफ अलकनंदा पावर प्रोजेक्ट, टीएचडीसी, एनएचपीसी समेत कई कंपनियों ने अदालत का रुख किया था।

ताजा फैसले के बाद राज्य में जलविद्युत परियोजनाओं और सरकार के बीच टैक्स को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है और इसका असर भविष्य की ऊर्जा नीतियों पर भी पड़ सकता है।

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